क्या यही देशभक्ति है?
संचिता सुषमा वाल्के
बिजली गायब है, गर्मी प्रचंड है।
पेट्रोल की कीमतें आसमान छू रही हैं।
रोज़गार कम है, महंगाई ज़्यादा है।
किसानों को खाद के लिए लाइन में लगना पड़ता है।
युवाओं के एग्जाम पेपर लीक हो जाते हैं और उनके सपने भी।
रुपया डॉलर के सामने लगातार कमजोर होता जा रहा है।
लेकिन हमसे कहा जाता है —
“सवाल मत पूछो… वरना देशद्रोही कहलाओगे।”
आज देशभक्ति का मतलब कुछ लोगों ने सिर्फ़ ताली बजाना, नारे लगाना और हर गलती पर चुप रहना बना दिया है।
अगर बिजली कटे तो सह लो।
अगर टैक्स बढ़े तो सह लो।
अगर बेरोज़गारी बढ़े तो सह लो।
अगर भ्रष्टाचार हो तो भी सह लो।
क्योंकि सरकार से सवाल पूछना अब “गुनाह” माना जाने लगा है।
लेकिन सच यह है कि लोकतंत्र में सवाल पूछना गद्दारी नहीं, जिम्मेदारी होती है।
सरकार जनता से ऊपर नहीं होती। सरकार जनता के टैक्स से चलती है, जनता के वोट से बनती है और जनता के प्रति जवाबदेह होती है।
अंधभक्ति और देशभक्ति में फर्क होता है।
अंधभक्ति कहती है — “जो हो रहा है, होने दो।”
देशभक्ति कहती है — “जो गलत है, उसे बदलो।”
अगर छात्र पेपर लीक पर सवाल पूछे तो वह देशद्रोही नहीं, अपने भविष्य के लिए चिंतित नागरिक है।
अगर किसान खाद और MSP की बात करे तो वह राष्ट्रविरोधी नहीं, देश का पेट पालने वाला इंसान है।
अगर आम आदमी महंगाई पर बोले तो वह दुश्मन नहीं, उसी देश का नागरिक है जिसने सरकार चुनी है।
देश किसी एक पार्टी, नेता या सरकार का नाम नहीं है।
देश का मतलब है — जनता।
और जनता की आवाज़ दबाकर कोई भी राष्ट्र मजबूत नहीं बन सकता।
और याद रखिए —
जो नागरिक अन्याय देखकर भी चुप रहता है,
वह सिर्फ़ अपनी आवाज़ नहीं खोता…
धीरे-धीरे अपना भविष्य भी खो देता है।
सच्ची देशभक्ति सत्ता के सामने झुकना नहीं, सच के साथ खड़ा होना है।
क्योंकि जो नागरिक सवाल पूछना छोड़ देता है, वह धीरे-धीरे अधिकार भी खो देता है।
इसलिए अगली बार जब कोई कहे —
“सरकार से सवाल मत पूछो, यही देशभक्ति है…”
तो याद रखिए,
लोकतंत्र में सबसे बड़ा देशभक्त वही होता है जो देश के हित में सत्ता से जवाब मांगता है।

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