संचिता सुषमा वाल्के 

मध्य पूर्व में बढ़ता युद्ध अब केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति की धुरी माने जाने वाले होर्मुज स्ट्रेट पर तनाव ने तेल बाजार की नींव हिला दी है। विशेषज्ञों की चेतावनी है कि यदि यह संकट लंबा खिंचा, तो दुनिया को अभूतपूर्व तेल संकट, महंगाई और आर्थिक अस्थिरता का सामना करना पड़ सकता है।
होर्मुज स्ट्रेट वैश्विक तेल व्यापार की जीवनरेखा है। दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में इसकी नाकेबंदी का असर केवल ईरान, सऊदी अरब या खाड़ी देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अमेरिका, यूरोप, एशिया और भारत जैसे तेल आयातक देशों तक सीधा पहुंचता है। आज जो हालात बन रहे हैं, वे यही संकेत दे रहे हैं कि दुनिया का ऊर्जा संतुलन बेहद नाजुक स्थिति में पहुंच चुका है।रिपोर्टों के अनुसार, मध्य पूर्व में तेल उत्पादन में भारी गिरावट आई है। सऊदी अरब, इराक, ईरान और कुवैत जैसे बड़े उत्पादक देशों की उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई है। इसका परिणाम यह हुआ कि दुनिया अब अपने “ऑयल बैंक” यानी पहले से संग्रहित तेल भंडार पर निर्भर होती जा रही है। लेकिन समस्या यह है कि ये भंडार असीमित नहीं हैं। युद्ध की स्थिति में इन्हें अस्थायी सुरक्षा कवच के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, स्थायी समाधान के रूप में नहीं।अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) और प्रमुख विश्लेषकों की चेतावनी चिंताजनक है। उनका मानना है कि यदि युद्ध लंबा चला, तो मांग और आपूर्ति के बीच खाई इतनी बढ़ सकती है कि बाजार अस्थिर हो जाए। तेल की कीमतों में उछाल केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर परिवहन, बिजली, खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की हर वस्तु पर दिखाई देगा। वैश्विक महंगाई फिर से नियंत्रण से बाहर जा सकती है।सबसे बड़ी चिंता यह है कि दुनिया के पास मौजूद तेल भंडार भी उतने उपयोगी नहीं हैं जितना आंकड़ों में दिखाई देता है। स्टोरेज में रखा गया हर बैरल तेल तुरंत बाजार में नहीं लाया जा सकता। उसका बड़ा हिस्सा तकनीकी और परिचालन जरूरतों में फंसा रहता है। विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित क्षेत्रों में भी भंडार से सीमित मात्रा में ही तेल निकाला जा सकता है। यानी संकट बढ़ने पर “सुरक्षा कवच” बहुत तेजी से कमजोर पड़ सकता है।यह स्थिति दुनिया को एक बड़ा सबक भी देती है। दशकों से वैश्विक अर्थव्यवस्था तेल पर अत्यधिक निर्भर रही है। वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की चर्चा तो बहुत हुई, लेकिन व्यवहार में तेल की केंद्रीय भूमिका कम नहीं हुई। आज जब एक समुद्री मार्ग के बाधित होने से पूरी दुनिया संकट में दिखाई दे रही है, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि ऊर्जा विविधीकरण केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और वैश्विक सुरक्षा का प्रश्न भी है।भारत जैसे देशों के लिए यह संकट और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित तेल से पूरा करता है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें लगातार बढ़ती रहीं, तो इसका सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ेगा। परिवहन महंगा होगा, उद्योगों की लागत बढ़ेगी और महंगाई का दबाव फिर तेज हो सकता है। ऐसे समय में भारत को ऊर्जा सुरक्षा, रणनीतिक तेल भंडार और वैकल्पिक ऊर्जा निवेश पर और गंभीरता से काम करना होगा।फिलहाल दुनिया युद्ध और बाजार के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। लेकिन सच्चाई यही है कि यदि होर्मुज स्ट्रेट जल्दी नहीं खुलता और संघर्ष समाप्त नहीं होता, तो आने वाले महीनों में वैश्विक अर्थव्यवस्था एक नए ऊर्जा संकट की ओर बढ़ सकती है। दुनिया के “ऑयल बैंक” तेजी से खाली हो रहे हैं और यह चेतावनी केवल बाजार के लिए नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक व्यवस्था के लिए है।