संचिता सुषमा वाल्के 

मध्य प्रदेश सरकार ने एक बार फिर बाजार से 2800 करोड़ रुपये का कर्ज लेने का फैसला किया है। वित्त विभाग ने राज्य विकास ऋण (SDL) के जरिए 1600 करोड़ और 1200 करोड़ रुपये के बॉन्ड जारी करने की अधिसूचना जारी कर दी है। इसके साथ ही चालू वित्त वर्ष में लिया गया कुल कर्ज 13,800 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा और प्रदेश पर कुल देनदारी 5.02 लाख करोड़ रुपये के पार चली जाएगी।सवाल यह है कि आखिर सरकार विकास कर रही है या विकास के नाम पर आने वाली पीढ़ियों के कंधों पर कर्ज का पहाड़ खड़ा कर रही है?हर बार सरकार यही तर्क देती है कि कर्ज विकास परियोजनाओं, बुनियादी ढांचे और जनकल्याणकारी योजनाओं के लिए लिया जा रहा है। लेकिन जमीन पर तस्वीर कुछ और नजर आती है। प्रदेश के कई हिस्सों में सड़कें बदहाल हैं, सरकारी अस्पताल संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं, स्कूलों में शिक्षकों के पद खाली हैं और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर लगातार सीमित होते जा रहे हैं। यदि कर्ज का पैसा वास्तव में विकास में लग रहा है तो उसका असर आम नागरिक के जीवन में स्पष्ट क्यों नहीं दिख रहा?चिंता की बात यह भी है कि प्रदेश का कर्ज अब 5 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है। इसका मतलब है कि हर नया जन्म लेने वाला बच्चा भी हजारों रुपये के कर्ज के बोझ के साथ इस दुनिया में कदम रख रहा है। सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन कर्ज की किश्तें और ब्याज जनता के टैक्स से ही चुकाए जाते हैं।वित्तीय अनुशासन किसी भी सरकार की सबसे बड़ी पहचान होता है। यदि आय बढ़ाने के बजाय लगातार उधारी ही आसान रास्ता बन जाए, तो यह आर्थिक प्रबंधन की कमजोरी का संकेत माना जाएगा। सरकार को यह बताना चाहिए कि पिछले वर्षों में लिए गए लाखों करोड़ रुपये के कर्ज से प्रदेश को कितना प्रत्यक्ष लाभ मिला, कितनी स्थायी संपत्तियां बनीं और कितने रोजगार सृजित हुए।लोकतंत्र में कर्ज लेना अपराध नहीं है, लेकिन बिना स्पष्ट जवाबदेही के लगातार कर्ज बढ़ाना निश्चित रूप से चिंता का विषय है। विकास की चमकदार घोषणाओं के पीछे यदि बढ़ती देनदारियों का अंधेरा छिपा हो, तो जनता को सवाल पूछने का पूरा अधिकार है।मध्य प्रदेश को आज सिर्फ नए कर्ज की नहीं, बल्कि नई आर्थिक सोच की जरूरत है। वरना विकास के नाम पर लिया जा रहा यह कर्ज आने वाले वर्षों में प्रदेश की वित्तीय स्वतंत्रता पर सबसे बड़ा संकट बन सकता है। जनता को यह जानने का हक है कि आखिर 5 लाख करोड़ रुपये के कर्ज का हिसाब कौन देगा?