संचिता सुषमा वाल्के 

भारत विरोधाभासों का देश है। एक ओर हम दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने का दावा करते हैं, तकनीक और नवाचार के क्षेत्र में वैश्विक पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर हमारा सार्वजनिक विमर्श अक्सर ऐसे व्यक्तियों के इर्द-गिर्द घूमता दिखाई देता है जिन्हें कानून ने गंभीर अपराधों का दोषी ठहराया है।हाल ही में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को एक बार फिर पैरोल मिलने की खबर चर्चा में रही। यह पहली बार नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में उन्हें कई बार पैरोल और फरलो मिल चुकी है। सवाल केवल एक व्यक्ति का नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था का है जो आम नागरिक और प्रभावशाली व्यक्तियों के लिए अलग-अलग दिखाई देती है।

कानून सबके लिए बराबर है, लेकिन क्या व्यवहार भी बराबर है?

भारतीय संविधान और न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत है कि कानून की नजर में सभी नागरिक समान हैं। लेकिन जब एक सजायाफ्ता व्यक्ति बार-बार जेल से बाहर आता है, उसके स्वागत में काफिले निकलते हैं, कार्यक्रम आयोजित होते हैं और मीडिया का एक हिस्सा उसे सेलिब्रिटी की तरह प्रस्तुत करता है, तब आम नागरिक के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है।पैरोल और फरलो कानूनी प्रावधान हैं। इनका उद्देश्य कैदी को विशेष परिस्थितियों में अस्थायी राहत देना है। लेकिन जब इन सुविधाओं का उपयोग इतनी बार होने लगे कि सजा और स्वतंत्रता के बीच की रेखा धुंधली पड़ जाए, तब व्यवस्था की निष्पक्षता पर प्रश्न उठना लाज़िमी है।

आखिर बाबाओं पर इतना विश्वास क्यों?

भारत में आध्यात्मिक परंपराओं का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है। लोगों का संतों और गुरुओं के प्रति सम्मान स्वाभाविक है। समस्या तब शुरू होती है जब आस्था अंधभक्ति में बदल जाती है।कई तथाकथित बाबा स्वयं को धर्म, अध्यात्म और समाजसेवा का प्रतीक बताते हैं। वे विशाल संगठन खड़े करते हैं, करोड़ों अनुयायी जुटाते हैं और धीरे-धीरे सामाजिक तथा राजनीतिक प्रभाव हासिल कर लेते हैं। उनके अनुयायी उन्हें साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि चमत्कारी शक्ति वाला व्यक्तित्व मानने लगते हैं। ऐसे में उनके खिलाफ उठने वाले आरोपों को भी भक्त स्वीकार नहीं कर पाते।
यही कारण है कि गंभीर अपराधों में दोषसिद्धि के बाद भी कुछ बाबाओं की लोकप्रियता समाप्त नहीं होती।

राजनीति और बाबाओं का गठजोड़

भारतीय लोकतंत्र में संख्या महत्वपूर्ण है। जहां लाखों वोट हों, वहां राजनीतिक दलों की दिलचस्पी होना स्वाभाविक है। यही कारण है कि कई धार्मिक और सामाजिक संगठनों का राजनीतिक प्रभाव बढ़ता गया है।चुनावों के दौरान नेताओं का बड़े धार्मिक संगठनों के प्रमुखों से मिलना, उनका समर्थन प्राप्त करने की कोशिश करना और उनके अनुयायियों को वोट बैंक के रूप में देखना कोई नई बात नहीं है।जब धर्म, राजनीति और जनसमर्थन का यह त्रिकोण बन जाता है, तब कानून का निष्पक्ष क्रियान्वयन कठिन दिखाई देने लगता है। भले ही व्यवस्था औपचारिक रूप से निष्पक्ष हो, लेकिन जनता के मन में संदेह पैदा हो जाता है।

मीडिया की भूमिका पर भी सवाल?

लोकतंत्र में मीडिया का काम सत्ता से सवाल पूछना है। लेकिन जब किसी सजायाफ्ता व्यक्ति के जेल से बाहर आने को उत्सव की तरह दिखाया जाए, उसके काफिलों, कपड़ों और कार्यक्रमों पर घंटों चर्चा हो, तब पत्रकारिता का उद्देश्य कमजोर पड़ता है।इसी दौरान देश की अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।आज दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर तकनीक और नवाचार की दौड़ में आगे बढ़ रही है। ताइवान जैसी छोटी अर्थव्यवस्था वैश्विक चिप उद्योग के दम पर विश्व बाजार में अपनी स्थिति मजबूत कर रही है। वहीं भारत में सार्वजनिक चर्चा का बड़ा हिस्सा अब भी व्यक्तिपूजा और विवादित धार्मिक नेताओं के इर्द-गिर्द घूमता दिखाई देता है।प्रश्न यह नहीं है कि किसी व्यक्ति के कितने अनुयायी हैं या उसने कितने सामाजिक कार्य किए हैं। प्रश्न यह है कि क्या कानून का पालन सभी के लिए समान रूप से हो रहा है? क्या प्रभाव, पैसा और राजनीतिक महत्व किसी व्यक्ति को विशेष सुविधा दिला सकते हैं?यदि आम नागरिक के मन में यह धारणा बनने लगे कि न्याय और कानून का व्यवहार व्यक्ति की हैसियत देखकर बदलता है, तो लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी—जनविश्वास—कमजोर पड़ने लगती है।भारत को यह तय करना होगा कि वह व्यक्तिपूजा की राजनीति और अंधभक्ति के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहता है या संस्थाओं की मजबूती के रास्ते पर। किसी भी लोकतंत्र की शक्ति उसके नेताओं, बाबाओं या प्रभावशाली व्यक्तियों में नहीं, बल्कि उसके कानून और संस्थाओं की निष्पक्षता में होती है।आस्था व्यक्तिगत विषय हो सकती है, लेकिन न्याय व्यवस्था सार्वजनिक विश्वास का प्रश्न है। और जब न्याय पर सवाल उठने लगें, तब समाज को व्यक्ति नहीं, व्यवस्था पर चर्चा करनी चाहिए।