संचिता सुषमा वाल्के 

रोज़ाना महज़ 300 रुपये कमाने वाला एक पिता अपनी बेटी की आँखों में डॉक्टर बनने का सपना देखता है। उस सपने को ज़िंदा रखने के लिए वह कर्ज़ लेने से भी नहीं हिचकता। पेट काट लेता है, ज़रूरतें टाल देता है, लेकिन बेटी की पढ़ाई नहीं रुकने देता। विडंबना देखिए—जो पिता गरीबी से हार नहीं माना, वह व्यवस्था की बेरुखी से हार गया।परीक्षा केंद्र के बाहर वह हाथ जोड़ता रहा, मिन्नतें करता रहा कि "सिर्फ दो मिनट की बात है, मेरी बेटी का भविष्य दांव पर है।" लेकिन नियमों की दुहाई देने वालों के दिल नहीं पसीजे। दरवाज़ा बंद रहा और एक गरीब बेटी का पूरा साल भी।कहा जाएगा कि "नियम सबके लिए समान हैं।" बिल्कुल होने चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या नियमों का उद्देश्य न्याय है या केवल कठोरता दिखाना? अगर दो मिनट की मानवीय संवेदना किसी मेधावी छात्र का एक साल बचा सकती थी, तो वह संवेदना दिखाई क्यों नहीं गई?यह घटना सिर्फ एक पिता और एक बेटी की नहीं है। यह उन लाखों परिवारों की कहानी है, जिनके सपने रोज़ गरीबी से लड़ते हैं। जिनके घरों में सफलता का रास्ता एसी कमरों से नहीं, बल्कि पसीने, भूख और संघर्ष से होकर गुजरता है। ऐसे माता-पिता अपने बच्चों की किताबों में अपना भविष्य लिखते हैं, लेकिन हमारी व्यवस्था उनकी तकदीर पर बेरहमी से लाल लकीर खींच देती है।कानून का सम्मान होना चाहिए, पर संवेदनहीनता कभी कानून नहीं हो सकती। अगर व्यवस्था में मानवीय विवेक के लिए दो मिनट की भी जगह नहीं बची, तो फिर यह व्यवस्था नागरिकों की नहीं, सिर्फ फाइलों की रह गई है।आज उस पिता की आँखों में सिर्फ आँसू नहीं हैं, बल्कि व्यवस्था के प्रति टूटा हुआ विश्वास भी है। उसने सोचा था कि इंसानियत अभी ज़िंदा है, कोई उसकी मजबूरी समझेगा। लेकिन उस दिन परीक्षा केंद्र के गेट पर सिर्फ एक छात्रा नहीं रुकी, बल्कि इंसानियत भी ठिठक गई।यह हार किसी एक परिवार की नहीं, हमारे लोकतंत्र की भी है। क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत उसकी इमारतों, कानूनों और परीक्षाओं में नहीं, बल्कि नागरिकों के प्रति उसकी संवेदनशीलता में होती है।न जाने ऐसे कितने माता-पिता होंगे, जिनकी आँखों में बच्चों के सुनहरे सपने थे और जो व्यवस्था की बेरुखी के सामने आँसुओं में बह गए। उनके बच्चों की असफलता मेहनत की कमी से नहीं, बल्कि संवेदनहीन तंत्र की देन है।

आख़िर में सिर्फ एक सवाल—
क्या नियम इतने बड़े हो गए हैं कि उनके सामने एक गरीब की बेटी का भविष्य भी छोटा पड़ जाए?
अगर इसका जवाब "हाँ" है, तो समझ लीजिए कि परीक्षा में वह बेटी नहीं, हमारी व्यवस्था और हमारा समाज असफल हुआ है।