संचिता सुषमा वाल्के 

भोपाल में मानसून की दस्तक के साथ ही एक बार फिर वही सवाल सामने खड़ा है—क्या शहर हर साल बारिश में डूबने के लिए ही तैयार किया जाता है? पहली तेज बारिश के बाद सड़कों पर जलभराव, घंटों तक ट्रैफिक जाम, बंद पड़े नाले और गड्ढों में फंसे वाहन बताते हैं कि व्यवस्थाओं के दावे और जमीनी हकीकत के बीच अब भी बड़ा अंतर है।
शहर का हर नागरिक जानता है कि किन इलाकों में हर साल पानी भरता है। प्रशासन भी इन स्थानों से अनजान नहीं है। इसके बावजूद हालात में कोई ठोस बदलाव दिखाई नहीं देता। सवाल केवल बारिश का नहीं, बल्कि पूर्व तैयारी, निगरानी और जवाबदेही का है।
नालों की सफाई पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च होने के दावे किए जाते हैं। यदि सफाई समय पर और प्रभावी ढंग से हुई होती, तो पहली ही बारिश में पानी सड़कों पर क्यों उतर आता? यदि जल निकासी की व्यवस्था दुरुस्त होती, तो आम लोगों को घंटों जाम में क्यों फंसना पड़ता? इन सवालों के जवाब केवल प्रेस विज्ञप्तियों से नहीं, जमीन पर दिखाई देने चाहिए।
सबसे अधिक परेशानी आम नागरिकों को होती है। स्कूल जाने वाले बच्चों से लेकर दफ्तर पहुंचने वाले कर्मचारी, मरीजों को अस्पताल ले जाने वाले परिजन और छोटे कारोबारी—सभी इस अव्यवस्था की कीमत चुकाते हैं। बारिश प्राकृतिक घटना है, लेकिन उसे संकट में बदल देना प्रशासनिक कमजोरी का संकेत है।
भोपाल स्मार्ट सिटी की सूची में है। स्मार्ट शहर का मतलब केवल चौड़ी सड़कें, आकर्षक चौराहे और नई इमारतें नहीं होता। असली स्मार्टनेस ऐसी व्यवस्था में दिखाई देती है, जो सामान्य बारिश में भी नागरिकों का जीवन प्रभावित न होने दे। विकास की पहचान परियोजनाओं के उद्घाटन से नहीं, बल्कि उनके परिणामों से होती है।
अब जरूरत तात्कालिक राहत की नहीं, बल्कि स्थायी समाधान की है। शहर की ड्रेनेज व्यवस्था का वैज्ञानिक पुनर्मूल्यांकन हो, नालों पर अतिक्रमण हटे, निर्माण एजेंसियों की जवाबदेही तय हो और प्रत्येक मानसून से पहले किए गए कार्यों का स्वतंत्र सामाजिक ऑडिट कराया जाए। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक हर बरसात के बाद वही तस्वीरें और वही दावे दोहराए जाते रहेंगे।
भोपाल झीलों का शहर है। इसकी पहचान पानी से है, लेकिन पानी की वजह से शहर का ठहर जाना किसी भी आधुनिक शहर के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकता। यह समय बहाने खोजने का नहीं, व्यवस्था सुधारने का है। नागरिकों को भरोसा चाहिए कि अगली बारिश में शहर डूबेगा नहीं, बल्कि व्यवस्था अपनी जिम्मेदारी निभाती हुई दिखाई देगी।