क्या ढाई साल बाद जनता के बीच लौटे मुख्यमंत्री?
संचिता सुषमा वाल्के
लोकतंत्र में किसी मुख्यमंत्री की सबसे बड़ी ताकत उसकी कुर्सी नहीं, बल्कि जनता के बीच उसकी मौजूदगी होती है। सचिवालय की फाइलें सरकार चला सकती हैं, लेकिन जनता का भरोसा नहीं जीत सकतीं। भरोसा तब बनता है, जब सत्ता खुद लोगों के दरवाज़े तक पहुँचे।
मध्यप्रदेश में पिछले ढाई वर्षों के दौरान एक सवाल बार-बार सुनाई देता रहा—सरकार तो दिख रही है, लेकिन मुख्यमंत्री कहाँ हैं? योजनाओं की कमी नहीं थी, घोषणाएँ भी लगातार होती रहीं, विभागों की समीक्षा भी चलती रही, लेकिन आम आदमी को वह राजनीतिक नेतृत्व कम दिखाई दिया, जो लोकतंत्र की सबसे अहम कड़ी होता है।
डॉ. मोहन यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद लोगों को एक नई कार्यशैली की उम्मीद थी। स्वाभाविक भी था। हर नया नेतृत्व अपनी अलग पहचान बनाना चाहता है। लेकिन समय बीतने के साथ यह धारणा मजबूत होती गई कि सरकार का चेहरा जनता से ज़्यादा सचिवालय की बैठकों में दिखाई दे रहा है। प्रशासन सक्रिय था, मगर राजनीतिक नेतृत्व की सीधी उपस्थिति उतनी प्रभावी नहीं दिखी।
यही वह दौर था जब लोगों के बीच यह चर्चा भी होने लगी कि क्या प्रदेश में निर्णय जनप्रतिनिधि ले रहे हैं या नौकरशाही? लोकतंत्र में अधिकारी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं, लेकिन वे जनता के प्रतिनिधि नहीं होते। उनका काम नीतियों को लागू करना है, न कि सरकार का चेहरा बन जाना।
इसी पृष्ठभूमि में मुख्यमंत्री की कुकरू यात्रा चर्चा का विषय बनी। पहली बार यह संदेश स्पष्ट रूप से सामने आया कि मुख्यमंत्री सीधे लोगों के बीच जाकर उनकी बात सुनना चाहते हैं। यह केवल एक सरकारी दौरा नहीं था, बल्कि उस धारणा को बदलने की कोशिश भी थी, जो पिछले कुछ समय में बन चुकी थी।
सवाल यह नहीं है कि मुख्यमंत्री कितनी बैठकें करते हैं। सवाल यह है कि जनता उन्हें कितना महसूस करती है। मुख्यमंत्री की पहचान फाइलों की गति से नहीं, जनता की धड़कनों से तय होती है। यदि गाँव का किसान, शहर का व्यापारी, युवा, महिला और आम नागरिक यह महसूस करे कि उसकी बात सीधे मुख्यमंत्री तक पहुँच सकती है, तभी लोकतंत्र जीवंत माना जाएगा।

यह भी सच है कि पिछले कुछ वर्षों में नौकरशाही का प्रभाव पहले की तुलना में अधिक दिखाई दिया। कई बार ऐसा लगा कि सरकार का मूल्यांकन भी वही कर रही है और जनता की संतुष्टि का प्रमाणपत्र भी वही बाँट रही है। लेकिन सरकारी रिपोर्ट और ज़मीनी हकीकत हमेशा एक जैसी नहीं होतीं। दोनों के बीच की दूरी केवल वही नेतृत्व समझ सकता है, जो जनता के बीच लगातार मौजूद रहे।
मुख्यमंत्री की हालिया सक्रियता स्वागतयोग्य है। लेकिन लोकतंत्र में एक-दो यात्राएँ नहीं, बल्कि निरंतर संवाद महत्वपूर्ण होता है। जनता यह नहीं देखती कि मुख्यमंत्री कितने किलोमीटर चले, बल्कि यह देखती है कि उसकी समस्याओं के समाधान तक सरकार कितनी दूर गई।
आज मध्यप्रदेश को ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो सचिवालय और चौपाल के बीच की दूरी समाप्त करे। जहाँ समीक्षा बैठकों के साथ-साथ गाँव की चौपाल भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो। जहाँ फाइलों की भाषा से पहले जनता की आवाज़ सुनी जाए। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ी रिपोर्ट जनता लिखती है, न कि अधिकारी।
अब असली परीक्षा शुरू होती है। क्या यह जनसंपर्क केवल एक यात्रा तक सीमित रहेगा, या आगे चलकर शासन की स्थायी कार्यशैली बनेगा? यदि मुख्यमंत्री लगातार जनता के बीच रहेंगे, तो प्रशासन भी अधिक जवाबदेह होगा और सरकार की विश्वसनीयता भी मजबूत होगी। लेकिन यदि यह सक्रियता केवल प्रतीकात्मक साबित हुई, तो जनता फिर वही सवाल पूछेगी—मुख्यमंत्री आखिर हैं कहाँ?
लोकतंत्र में नेता की ऊँचाई उसके पद से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से तय होती है कि संकट की घड़ी में जनता उसे अपने बीच कितना पाती है। मुख्यमंत्री की असली पहचान राजभवन, मंत्रालय या सचिवालय से नहीं, बल्कि उस चौपाल से बनती है जहाँ बिना औपचारिकता के जनता अपनी बात कह सके।
मध्यप्रदेश की राजनीति अब ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ जनता घोषणाओं से अधिक संवाद चाहती है। आने वाले समय में यही तय करेगा कि यह बदली हुई तस्वीर स्थायी नेतृत्व का संकेत है या फिर केवल एक राजनीतिक संदेश।

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