संचिता सुषमा वाल्के 

किसी भी समाज और प्रशासन की वास्तविक परीक्षा संकट के समय नहीं, बल्कि संकट आने से पहले उसकी तैयारी में होती है। दुर्भाग्य से हमारे यहां अक्सर हालात इसके विपरीत दिखाई देते हैं। कोई बड़ी घटना घटती है, लोग प्रभावित होते हैं, प्रशासन सक्रिय होता है, कुछ दिनों तक कार्रवाई और बयानबाजी चलती है, फिर सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। सवाल यह है कि क्या हम केवल हादसों के बाद ही जागेंगे?हाल ही में एक निजी विद्यालय में लंच के बाद लगभग 100 बच्चों की तबीयत खराब होने की खबर ने पूरे शहर को झकझोर दिया। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार खाद्य सामग्री की गुणवत्ता और एक्सपायरी उत्पादों के उपयोग को लेकर सवाल उठे हैं। यह घटना केवल एक स्कूल तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारे निरीक्षण और निगरानी तंत्र की कमजोरी को उजागर करती है।
मई माह के पहले पखवाड़े में खाद्य पदार्थों, विशेषकर दूध, दही, पनीर और मावे में मिलावट को लेकर चेतावनी दी गई थी। उसके बाद खाद्य विभाग ने कुछ दिनों तक सघन कार्रवाई की, नमूने लिए गए, जांच हुई, लेकिन फिर वही पुरानी स्थिति लौट आई। यदि जांच और निगरानी नियमित रूप से होती रहती, तो शायद ऐसी घटनाओं की संभावना कम हो सकती थी।ऐसा ही दृश्य हाल ही में दिल्ली के एक होटल में लगी भीषण आग के बाद भी देखने को मिला। कई लोगों ने अपनी जान गंवाई। घटना के बाद देशभर में फायर सेफ्टी को लेकर अभियान चलाए गए, निरीक्षण हुए, नोटिस जारी किए गए, लेकिन कुछ समय बाद सारी सक्रियता ठंडी पड़ गई। प्रश्न यह है कि यदि सुरक्षा मानकों का पालन नियमित रूप से सुनिश्चित किया जाए, तो क्या ऐसे हादसों को काफी हद तक रोका नहीं जा सकता?
वर्तमान में बारिश का मौसम है। तालाबों की सफाई, गहरीकरण और जल संरक्षण अभियान चलाए जा रहे हैं। लेकिन यह कार्य अप्रैल या उससे पहले शुरू होना चाहिए था। हर वर्ष मानसून आने पर ही जल संरक्षण की याद क्यों आती है? क्या योजनाएं केवल मौसम और संकट के अनुसार ही बनेंगी?वास्तव में समस्या केवल प्रशासन की नहीं, समाज की भी है। हम भी तब तक गंभीर नहीं होते जब तक कोई समस्या हमारे सामने खड़ी न हो जाए। दुर्घटना हो जाए तो सुरक्षा की बात करते हैं, बीमारी फैल जाए तो स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर चर्चा करते हैं, जल संकट आए तो संरक्षण की चिंता करते हैं। जबकि रोकथाम की संस्कृति विकसित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।किसी एक घटना के बाद लाइसेंस निरस्त करने, नोटिस जारी करने या कुछ दिनों तक अभियान चलाने से स्थायी समाधान नहीं निकलता। आवश्यकता है कि खाद्य सुरक्षा जांच, फायर सेफ्टी ऑडिट, नाला टेपिंग, जल संरक्षण और अन्य जनहित के कार्य सतत प्रक्रिया के रूप में संचालित हों। निगरानी केवल कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि नियमित और प्रभावी हो।यदि हम सचमुच ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना चाहते हैं, तो हमें प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि पूर्व-सक्रिय व्यवस्था विकसित करनी होगी। क्योंकि हर हादसा केवल एक खबर नहीं होता, बल्कि कई परिवारों की पीड़ा और व्यवस्था की विफलता का आईना होता है।आखिर कब तक हम हर दुर्घटना के बाद जागते रहेंगे? क्या हम ऐसा समाज और प्रशासन नहीं बना सकते जो घटना घटने से पहले ही चेत जाए?