आस्था के आईने में इंसानियत की तलाश

संचिता सुषमा वाल्के 

हमारे समाज की एक बड़ी खूबसूरती यह है कि यहाँ प्रकृति, पशु-पक्षियों, नदियों, पर्वतों और यहाँ तक कि पत्थरों तक में दिव्यता देखने की परंपरा रही है। हम मंदिर में रखी मूर्ति में भगवान के दर्शन करते हैं, गाय में माँ का स्वरूप देखते हैं, और श्राद्ध के समय कौवे में अपने पूर्वजों की उपस्थिति का सम्मान करते हैं। यह संवेदनशीलता और श्रद्धा हमारी संस्कृति की पहचान है।लेकिन इसी श्रद्धा के बीच एक सवाल बार-बार मन को झकझोरता है—जब हम पत्थर में भगवान देख सकते हैं, तो इंसान में इंसान क्यों नहीं देख पाते?

यही प्रश्न आज के समाज की सबसे बड़ी विडंबना को उजागर करता है।

आस्था बढ़ी, लेकिन संवेदनाएँ क्यों घटीं?

आज धार्मिक आयोजन पहले से अधिक भव्य हैं, पूजा-पाठ के साधन पहले से अधिक उपलब्ध हैं, और आध्यात्मिक चर्चा भी पहले से अधिक दिखाई देती है। फिर भी समाज में नफरत, भेदभाव, हिंसा, अपमान और असहिष्णुता कम होने के बजाय कई बार बढ़ती हुई नजर आती है।हम मंदिर में सिर झुकाते हैं, लेकिन सड़क पर किसी जरूरतमंद को देखकर आँखें फेर लेते हैं। हम पशुओं को भोजन कराने में पुण्य समझते हैं, लेकिन किसी भूखे इंसान को देखकर असहज हो जाते हैं। हम पूर्वजों के सम्मान में अनुष्ठान करते हैं, लेकिन अपने ही बुजुर्ग माता-पिता को समय देने में कंजूसी करते हैं।
ऐसा लगता है कि हमने पूजा के प्रतीकों को तो समझ लिया, लेकिन उनके पीछे छिपे मानवीय संदेश को कहीं खो दिया।

इंसान को इंसान की तरह देखने में बाधा क्या है?

शायद इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि इंसान को इंसान की तरह देखने के लिए केवल आँखें नहीं, बल्कि हृदय की आवश्यकता होती है।
पत्थर हमसे सवाल नहीं करता, गाय हमारे विचारों का विरोध नहीं करती, कौवा हमारी मान्यताओं को चुनौती नहीं देता। लेकिन इंसान अलग सोचता है, अलग बोलता है, अलग धर्म, जाति, भाषा और विचार रखता है। यहीं से हमारा अहंकार और पूर्वाग्रह सक्रिय हो जाता है।
हम व्यक्ति को उसकी मानवता से पहले उसकी पहचान से तौलने लगते हैं। कोई किस धर्म का है, किस जाति का है, किस विचारधारा का है—यह सब उसके इंसान होने से बड़ा बना दिया जाता है।
और जब पहचानें मानवता पर भारी पड़ने लगती हैं, तब इंसान में इंसान दिखाई देना बंद हो जाता है।

धर्म का मूल संदेश क्या है?

दुनिया के लगभग सभी धर्म करुणा, प्रेम, सहानुभूति और सेवा का संदेश देते हैं। किसी भी पूजा, व्रत, तीर्थ या अनुष्ठान का अंतिम उद्देश्य मनुष्य को बेहतर इंसान बनाना है।
यदि हमारी आस्था हमें विनम्र नहीं बनाती, यदि हमारी पूजा हमें दयालु नहीं बनाती, यदि हमारा धर्म हमें इंसान का सम्मान करना नहीं सिखाता, तो फिर हमें अपने धार्मिक व्यवहार पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।
क्योंकि ईश्वर की सबसे सुंदर रचना यदि कोई है, तो वह इंसान ही है।
समय की सबसे बड़ी आवश्यकता: इंसानियत

आज समाज को केवल धार्मिकता नहीं, बल्कि इंसानियत की आवश्यकता है। जरूरत इस बात की है कि हम मंदिर जाने से पहले किसी दुखी व्यक्ति की पीड़ा को समझें, गौसेवा के साथ-साथ मानवसेवा को भी महत्व दें, और पूर्वजों के सम्मान के साथ वर्तमान पीढ़ी के लोगों का भी आदर करें।जब हम किसी अनजान व्यक्ति के आँसू पोंछने लगेंगे, किसी जरूरतमंद की मदद करने लगेंगे, किसी भिन्न विचार वाले व्यक्ति का भी सम्मान करने लगेंगे, तब शायद हमें इंसान में इंसान दिखने लगेगा।पत्थर में भगवान देखना श्रद्धा है, गाय में माता देखना संस्कृति है, कौवे में पूर्वज देखना परंपरा है; लेकिन इंसान में इंसान देखना ही सच्ची मानवता है।जिस दिन हम किसी व्यक्ति को उसके धर्म, जाति, भाषा, रंग या विचार से पहले एक इंसान के रूप में देखना सीख जाएंगे, उस दिन शायद समाज की आधी समस्याएँ अपने आप समाप्त हो जाएँगी।आख़िरकार, ईश्वर को खोजने का सबसे सरल मार्ग मंदिरों, मूर्तियों और प्रतीकों से होकर जरूर जाता है, लेकिन उसकी अंतिम मंज़िल मानव हृदय ही है।क्योंकि जो इंसान में इंसान नहीं देख सकता, वह भगवान को भी पूरी तरह नहीं देख सकता।