संचिता सुषमा वाल्के 

शिक्षा बढ़ी, सोच कब बदलेगी?

अक्सर कहा जाता है कि “एक महिला की सबसे बड़ी दुश्मन दूसरी महिला होती है।” यह कथन हर परिस्थिति में सही नहीं माना जा सकता, क्योंकि समाज में महिलाओं ने ही महिलाओं के अधिकारों और सम्मान के लिए सबसे बड़े संघर्ष भी किए हैं। फिर भी कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जो इस कहावत को सच साबित करती हुई प्रतीत होती हैं और हमें सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि आखिर हमारी सामाजिक मानसिकता कब बदलेगी।भारत ने विज्ञान, तकनीक और शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। हम चाँद तक पहुँच चुके हैं, डिजिटल युग में जी रहे हैं और दुनिया के सामने अपनी क्षमताओं का परिचय दे रहे हैं। लेकिन इन उपलब्धियों के बावजूद समाज का एक बड़ा हिस्सा आज भी पुरानी और संकीर्ण सोच से मुक्त नहीं हो पाया है। विशेष रूप से महिलाओं के प्रति भेदभाव, दहेज प्रथा और घरेलू उत्पीड़न जैसी समस्याएँ आज भी हमारे सामने मौजूद हैं।एक समय था जब बेटियों को पढ़ने का अधिकार नहीं दिया जाता था, उन्हें घर की चारदीवारी तक सीमित रखा जाता था और उनकी इच्छाओं का कोई महत्व नहीं माना जाता था। दुखद बात यह है कि शिक्षा और आधुनिकता के इस दौर में भी कई महिलाओं को अपने सपनों, करियर और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना पड़ता है। दहेज जैसी कुप्रथा, जिसे समाज से समाप्त हो जाना चाहिए था, आज भी अनेक परिवारों में जीवित है।हाल ही में सामने आए कुछ मामलों ने यह प्रश्न फिर से खड़ा कर दिया है कि क्या केवल उच्च शिक्षा और प्रतिष्ठित पद किसी व्यक्ति की सोच को आधुनिक बना सकते हैं? जब पढ़े-लिखे और प्रभावशाली लोग भी दहेज, उत्पीड़न और भेदभाव जैसी मानसिकता को बढ़ावा देते हैं, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि समस्या शिक्षा की कमी से अधिक सोच की जड़ता में है। डिग्रियाँ व्यक्ति को ज्ञान दे सकती हैं, लेकिन संवेदनशीलता, समानता और मानवता का मूल्य उसे स्वयं अपनाना पड़ता है।सबसे दुखद स्थिति तब होती है जब एक महिला ही दूसरी महिला के अधिकारों और स्वतंत्रता के रास्ते में बाधा बनती है। सास-बहू के रिश्तों में तनाव, दहेज की मांग या बहू की स्वतंत्रता पर रोक जैसी घटनाएँ केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे समाज की सोच का प्रतिबिंब हैं। यह समझना होगा कि किसी महिला की प्रगति दूसरी महिला के सम्मान और सहयोग से ही संभव है, न कि उसके दमन से।समाज को बदलने के लिए केवल कानून पर्याप्त नहीं हैं। आवश्यकता है मानसिकता में परिवर्तन की। बेटियों और बेटों दोनों को बचपन से समानता, सम्मान और संवेदनशीलता के संस्कार दिए जाने चाहिए। महिलाओं को एक-दूसरे की प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि सहयोगी और शक्ति के रूप में देखना होगा।आज प्रश्न यह नहीं है कि हम कितने आधुनिक हो गए हैं, बल्कि यह है कि हमारी सोच कितनी आधुनिक हुई है। जिस दिन हम दहेज, भेदभाव और महिलाओं के प्रति संकीर्ण दृष्टिकोण को पूरी तरह त्याग देंगे, उसी दिन सच्चे अर्थों में प्रगतिशील समाज का निर्माण होगा। क्योंकि किसी देश की वास्तविक उन्नति उसकी तकनीकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उसके लोगों की सोच और मानवीय मूल्यों से मापी जाती है।यदि शिक्षा के साथ संवेदनशीलता और समानता नहीं जुड़ी, तो आधुनिकता केवल दिखावा बनकर रह जाएगी।

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