संचिता सुषमा वाल्के 
“बिकते पानी के दरिया में अब भाषण भी तैरेंगे…”

यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि आज के भारत के उस आम नागरिक की पीड़ा है जो रोज़मर्रा की समस्याओं से जूझते-जूझते थक चुका है। कहीं बिजली की कटौती है, कहीं पानी के लिए लंबी कतारें हैं, कहीं महंगाई रसोई का स्वाद छीन रही है, तो कहीं बेरोज़गारी युवाओं के सपनों को निगल रही है। लेकिन अफसोस यह है कि जब भी कोई इन मूलभूत समस्याओं पर सवाल उठाता है, तभी अचानक जाति और धर्म की बहसें हवा में तैरने लगती हैं। जनता की तकलीफें पीछे छूट जाती हैं और समाज आपसी संघर्षों में उलझ जाता है।
आज देश का नागरिक पूछ रहा है कि आखिर लोकतंत्र का असली मुद्दा क्या है?
क्या वह बिजली नहीं, जिसके बिना गर्मी में रातें काटना मुश्किल हो जाता है?
क्या वह पानी नहीं, जिसके लिए महिलाएं और बच्चे घंटों लाइन में खड़े रहते हैं?
क्या वह रोजगार नहीं, जिसके अभाव में युवा डिग्रियां लेकर भी निराश घूम रहे हैं?
क्या वह महंगाई नहीं, जिसने दूध, पेट्रोल, गैस और रोजमर्रा की हर वस्तु को आम आदमी की पहुंच से दूर कर दिया है?
लेकिन इन सवालों के जवाब देने के बजाय राजनीतिक गलियारों में अक्सर जाति और धर्म की ऐसी बहस छेड़ दी जाती है, जिससे असली मुद्दे धुंधले पड़ जाएं। समाज को भावनाओं में उलझा दिया जाता है ताकि जनता अपने अधिकारों और सुविधाओं की मांग भूल जाए।
सोचने वाली बात है कि जब किसी अस्पताल में मरीज को खून की जरूरत होती है, तब क्या डॉक्टर उसका धर्म या जाति पूछते हैं?
जब सीमा पर सैनिक देश की रक्षा के लिए खड़ा होता है, तब क्या वह अपने साथी जवान की जाति देखता है?
जब प्राकृतिक आपदाएं आती हैं, तब क्या पानी, आग या भूकंप इंसानों के धर्म देखकर नुकसान पहुंचाते हैं?
नहीं।
क्योंकि संकट के समय इंसानियत सबसे बड़ा धर्म बन जाती है।
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता है। यहां हर धर्म, हर जाति, हर भाषा और हर संस्कृति के लोग साथ रहते हैं। यही हमारी पहचान है, यही हमारी खूबसूरती है। अलग-अलग परंपराएं और नियम होना स्वाभाविक है, लेकिन उन पर लड़ना और समाज को बांटना किसी भी सभ्य राष्ट्र के लिए उचित नहीं हो सकता।
आज जरूरत मंदिर-मस्जिद की बहस से ज्यादा अस्पताल, स्कूल, पानी और रोजगार की है। जरूरत इस बात की है कि सरकारें जनता को बुनियादी सुविधाएं देने की जवाबदेही निभाएं। चुनावों में “जल जीवन मिशन”, “हर घर जल”, “24 घंटे बिजली” और “रोजगार” के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन कई इलाकों में आज भी नलों से पानी नहीं, केवल हवा निकलती है। सड़कों पर टैंकर दिखाई देते हैं, योजनाओं के विज्ञापन दिखाई देते हैं, लेकिन प्यासे घरों तक राहत नहीं पहुंचती।
महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है।
दूध, पेट्रोल, सीएनजी, गैस और बिजली के बढ़ते दामों ने हर परिवार का बजट बिगाड़ दिया है। मध्यम वर्ग संघर्ष कर रहा है और गरीब वर्ग रोज़ नई मुश्किलों का सामना कर रहा है। बेरोज़गार युवा भविष्य को लेकर चिंतित हैं, किसान लागत और मौसम के बीच पिस रहा है, और आम नागरिक व्यवस्था से जवाब मांग रहा है।
लोकतंत्र केवल भाषणों से नहीं चलता, बल्कि जनता की मूलभूत जरूरतों को पूरा करने से चलता है। सत्ता का अर्थ केवल कुर्सी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है। जनता वोट इसलिए नहीं देती कि उसे जातीय और धार्मिक संघर्षों में उलझा दिया जाए, बल्कि इसलिए देती है कि उसके जीवन को बेहतर बनाया जाए।
समाज को भी अपनी भूमिका समझनी होगी। यदि हर बार हम भावनात्मक मुद्दों में उलझकर अपने असली प्रश्न भूल जाएंगे, तो समस्याएं कभी खत्म नहीं होंगी। पानी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार केवल राजनीतिक मुद्दे नहीं, बल्कि हर नागरिक का अधिकार हैं। इन पर सवाल पूछना लोकतंत्र की मजबूती है, कमजोरी नहीं।
आज समय की मांग है कि जनता जागरूक बने, मुद्दों को पहचाने और विकास की राजनीति को प्राथमिकता दे। हर बूंद पानी बचाने, हर युवा को अवसर देने और हर परिवार तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर प्रयास होने चाहिए। वरना आने वाली पीढ़ियां शायद किताबों में पढ़ेंगी कि कभी धरती पर पानी नाम की चीज हुआ करती थी।
अगर देश को मजबूत बनाना है तो जाति और धर्म से ऊपर उठकर इंसानियत, विकास और जनहित की बात करनी होगी। क्योंकि आखिर में प्यास किसी धर्म की नहीं होती, भूख किसी जाति की नहीं होती, और तकलीफ किसी एक वर्ग की नहीं होती — वह पूरे समाज की होती है।
जनता अब भाषण नहीं, समाधान चाहती है।