एक तरफ ब्रदर्स डे दूसरी तरफ बहन की चिंता - आखिर हमारा समाज किस दिशा की ओर जा रहा है ?
24 मई : ब्रदर्स डे और समाज का कड़वा सच
संचिता सुषमा वाल्के
24 मई को पूरी दुनिया में “ब्रदर्स डे” मनाया जाता है।
यह दिन भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और सुरक्षा के रिश्ते का प्रतीक माना जाता है।
लेकिन शायद किसी भाई ने कभी यह नहीं सोचा होगा कि इसी दिन उसे अपनी बहन को मूक अग्नि देनी पड़ेगी।
भोपाल के कटारा क्षेत्र में रहने वाली ट्विशा का लगभग 11 दिनों बाद अंतिम संस्कार किया गया। यह केवल एक परिवार का दुःख नहीं, बल्कि पूरे समाज के सामने खड़ा एक असहज प्रश्न है —
क्या हम सच में आधुनिक हो गए हैं, या सिर्फ हमारी तकनीक आधुनिक हुई है और सोच अब भी वही पुरानी है?
हर दिन न जाने कितनी “ट्विशा” हिंसा, मानसिक प्रताड़ना, सामाजिक दबाव और रिश्तों की टूटन का शिकार हो रही हैं।
कुछ घटनाएँ समाचार बन जाती हैं, लेकिन अधिकांश दर्द घर की चारदीवारी में ही दम तोड़ देते हैं।
आज सोशल मीडिया का दौर है।
लोग हजारों “फॉलोअर्स” रखते हैं, लेकिन अपने ही घर के लोगों की तकलीफ को समझने का समय नहीं निकाल पाते।
हम डिजिटल रूप से जितने जुड़े हुए दिखाई देते हैं, भावनात्मक रूप से उतने ही दूर होते जा रहे हैं।
एक समय था जब परिवार साथ बैठकर सुख-दुःख बाँटते थे।
आज एक ही घर में छह लोग रहते हैं, लेकिन किसी के पास एक-दूसरे से बात करने का समय नहीं है।
हर कोई मोबाइल स्क्रीन में व्यस्त है।
परिणाम यह है कि मानसिक तनाव, अकेलापन और गलतफहमियाँ धीरे-धीरे हिंसा का रूप लेने लगी हैं।
समाज में महिलाओं के खिलाफ हिंसा लंबे समय से गंभीर समस्या रही है और आज भी अनेक महिलाएँ इसका सामना कर रही हैं।
लेकिन इसके साथ यह भी सच है कि कई मामलों में कानूनों के गलत इस्तेमाल के कारण पुरुष भी मानसिक और सामाजिक प्रताड़ना का शिकार हो रहे हैं।
इसलिए आवश्यकता किसी एक पक्ष को दोष देने की नहीं, बल्कि न्याय, संवेदनशीलता और संतुलन की है।
कानून तभी प्रभावी बनता है जब समाज जागरूक हो।
हर व्यक्ति को यह समझना होगा कि समस्या आने पर चुप रहना समाधान नहीं है।
परिवार के सदस्यों से खुलकर बात करना, मानसिक तनाव को साझा करना और समय रहते कानूनी या सामाजिक सहायता लेना बहुत जरूरी है।
हमें अपने बच्चों को केवल करियर और प्रतियोगिता नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और संवाद भी सिखाना होगा।
क्योंकि जिस समाज में लोग एक-दूसरे का दर्द सुनना बंद कर देते हैं, वहाँ रिश्ते धीरे-धीरे सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाते हैं।
ट्विशा जैसी घटनाएँ केवल खबर नहीं हैं, बल्कि समाज के लिए चेतावनी हैं।
यदि आज भी हम नहीं जागे, यदि आज भी हमने परिवारों में संवाद और विश्वास को नहीं बचाया, तो कल न जाने कितनी और ज़िंदगियाँ इसी खामोशी में खो जाएँगी।
आधुनिक बनने का अर्थ केवल तकनीक और सोशल मीडिया नहीं है।
सच्ची आधुनिकता तब होगी जब समाज किसी भी पीड़ित — चाहे महिला हो या पुरुष — की बात सुने, उसे समझे और समय रहते उसका साथ दे।
क्योंकि अंत में, इंसान को सबसे ज्यादा जरूरत किसी “लाइक” या “फॉलो” की नहीं,
बल्कि अपने लोगों के साथ, विश्वास और संवाद की होती है।

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